फेमिनिज्म अर्थात नारीवाद, हिंदी लेखों में कायदे से “नारीवाद” आगे और “फेमिनिज्म” पीछे लिखा जाना चाहिए, लेकिन पिछले कुछ समय में इसके अंग्रेजी शब्द को अधिक ख्याती मिली है। आखिर फेमिनिज्म है क्या ? क्या यह केवल पुरूषों को गलियाने वाली महिलाओं की गिनती मात्र है? या फिर महिला उत्थान की बातें करने वाले लोगों के Feminism in India hindi नामभर है? इस पर समझ अपनी-अपनी है, लेकिन मेरे लिए सही मायनों में यह लैंगिक समानता है। अब सवाल उठता है, समानता कैसी? जब विधाता ने ही पुरूष और महिला को एक सामन नहीं बनाया? मैं भी इस बात से सहमत नहीं हूं, कि दोनों समान है, लेकिन मेरी इस बात से आप सहमत होंगे कि समान न होने पर भी समानतर चलने के कारण ही यह दोनों एक दूसरे के पुरक है। बावजूद इसके महिलाओं से भेदभाव क्यूं? क्या पहले ही ऐसा है? ऐसे ही वैदिक काल, मुगल काल व ब्रिटीश काल से जुड़ी कुछ जानकारी व समझ को इस लेख के माध्यम से सांझा कर रही हूं। जो हमें संविधान में समानता के अधिकार व नारीवाद को समझने में मदद करते हैं।
आज जब व्यक्ति चांद पर पहुंच गया है, फेसबुक ट्विटर, वट्स एप से सारी दुनिया मुठ्ठी में आ छिपी है। ऐसे दौर में महिलाओं के संदर्भ में दो सौ साल पुराने समानता के अधिकार जैसी बातें दकियानुसी मुद्दे प्रतीत होते है। लेकिन क्या करें, कहीं न कहीं समाज के हर वर्ग में किसी न किसी रूप में यह असमानता देखने को मिलती ही है। इस लेख में, मैं महिलाओं के उत्पीड़न नहीं बल्कि उनके सामाजिक संघर्ष के उतार चढ़ाव पर प्राकश डालने का प्रयास कर रही हूं। जिससे यह मालूम होता है, कि हम कहां से कहां आ पहुंचे हैं।
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